पेपर कटिंग

10 फरवरी को मेरठ में हुए ब्लागिंग सेमिनार एवं पुस्तक विमोचन कार्यक्रम अखबारों की ज़ुबानी। उन सभी पत्रकार दोस्तो का आभार जिन्होने पुस्तक की समीक्षा को इतने सून्दर ढंग से प्रस्तुत किया।

उपरोक्त समीक्षा दैनिक हिन्दूस्तान की मशहूर पत्रकार मनविंदर भिबंर जी ने की है। आप खुद भी ’मेरे आस पास’ के नाम से चर्चित ब्लाग चलाती है।
दैनिक हिन्दूस्तान की रिर्पोट
उपरोक्त समीक्षा वरिष्ठ स्तम्भकार सलीम अख्तर सिद्दीकी ने की है जो दैनिक DLA में प्रकाशित हुई। आप खुद भी ’हकबात’ के नाम से अपना ब्लाग चलाते है
दैनिक DLA की रिर्पोट
उपरोक्त समीक्षा दैनिक जागरण के युवा पत्रकार सचिन राठौड़ ने की है। आप खुद भी ’अपना समाज’ के नाम से अपना ब्लाग चलाते है
दैनिक राष्ट्रीय सहारा की रिर्पोट
दैनिक जागरण की रिर्पोट
बहूत सारे मित्र जानना चाह रहे है कि पुस्तक किस प्रकार से प्राप्त की जा सकती है। तो यह बेहद ही सरल है इसके लिए आप अपने शहर के AHW व्हीलर, या किसी भी प्रमुख बुक स्टाल से यह पुस्तक प्राप्त कर सकते है। क्योंकि ये पुस्तक भारत के सभी हिन्दीभाषी क्षेत्रों में सहज ही उपलब्ध है। इसके पश्चात भी यदी आपको पुस्तक ना मिले तब आप सीधे-सीधे 150 रूपये का एक मनीआर्डर प्रकाशक के नाम से भेजे जो इस प्रकार से होगा।
रवि पाकेट बुक्स
33 हरि नगर, मेरठ शहर (उ.प्र.) 250002
आपको कुछ दिन के अन्दर ही 336 पेज की यह पुस्तक डाक द्वारा भेज दी जाएगी। विशेष बात ये है कि सभी ब्लागर साथियों को पुस्तक बिना किसी डाक खर्च के भेजी जाएगी। इतना करने भी पुस्तक यदी आपको नही प्राप्त होती तब आप मुझे टिप्पणी करे और बताए। प्रकाशन की तरफ से एक पुस्तक मुझे भी भेंट की गई थी, उस अवस्था में आपको मैं अपनी ये इकलोती पुस्तक दे दूंगा।

मेरठ का ब्लागिंग सेमिनार कैमरे की नज़र से

चिंतामग्न दो व्यक्तित्व मनेश जैन, ’एटूजेडबुक्स’ सलीम अख्तर सिद्दीकी ’हकबात’
लेखकीय सम्बोधन
लो आ गई ब्लागिंग की पहली किताब हिन्दी में
विमोचन की रस्म
मंचीय गतिविधियां
मेरठ का ब्लागिंग सेमिनार का शुभारम्भ
विचारमग्न हरि जोशी जी ’इर्द-गिर्द’
हिन्दी ब्लागिंग का सशक्त स्वर- यशवंत सिंह
पहचानये कहां है मनविंदर भिंबर जी ’मेरे आस पास’ जी, रिचा जोशी जी ’इर्द-गिर्द’
यशंवत सिंह जी ’भड़ास’ सम्बोधित करते हुए
मंचासीन मेहमानों की आमद

लो हो गया ब्लागिंग सेमिनार मेरठ में

मेरठ का पहला ब्लागिंग सेमिनार अपने पूरे जोशो-खरोश अन्दाज में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के प्रेमचंद सेमिनार हाल में किया गया था। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो। एस. के. काक रहे तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता मशहूर उर्दू आलोचक असलम जमशेदपुरी कर रहे थे।
कार्यक्रम में आमंत्रित वक्ता के तौर पर सेमिनार का शुभारम्भ ’इर्द-गिर्द’ जैसा मशहूर ब्लाग चलाने वाले हरि जोशी जी से हुआ। हरि जोशी जी ने अपना वक्तव्य बहुत सादे अन्दाज से शुरू किया लेकिन जब वह मंच पर जम गए तब खूलकर हिन्दी ब्लागिंग पर बोले। उन्होने हिन्दी ब्लागिंग और परम्परागत् मीडिया के तरीको पर प्रकाश डाला साथ ही साथ अपने कुछ निजी अनुभवों का साझा भी किया। यहां एक बात में स्पष्ट तौर पर कहना चाहूंगा कि भारतीय पत्रकारिता के जिन चर्चित चेहरो को मैने व्यक्तिगत् तौर पर जाना है उनमे, प्रणव राय और राजदीप सरदेसाई अपना और दूसरो का बहुत ख्याल रखने वाले लोग है जो अपने ड्रेस सैंस और बाडी लैग्वेज को अपने व्यक्तित्व का अंग बना कर चलते है उनमे अब मैंने एक नाम हरि जोशी जी का भी जोड़ लिया हैं। सेमिनार में आप अपने डेशिंग और डायनेमिक अंदाज के कारण सब लोगो की निगाह में थे। अपना रखरखाव और बेहतर सलीके का प्रस्तुतिकरण सबको कहां आता है। हरि जोशी जी को जो भी लोग जानते है वह बखूबी समझते होगे कि वह पत्रकार कम और किसी कम्पनी के ब्रांड एम्बसेटर ज्यादा लगते है। वह अभी भी माडलिंग में अपना कैरियर बना सकते है।
आपके वक्तव्य के बाद सेमिनार की बागडोर ’भड़ास’ के यशवंत जी ने सम्भालीं। अपने जोरदार सम्बोधन और ठेठ अन्दाज में उन्होने अपनी बात शुरू की। हिन्दी ब्लागिंग का इतना जोरदार प्रतिनिधित्व करने वालो में, मैंने अभी तक कोई दूसरा व्यक्तित्व नही देखा। यशवंत जी झूमकर बोले और देर तक बोले। आपने ब्लागिंग को स्थानीयता से जोड़कर देखा और कहा- जिन खबरों को मुख्यधारा के मीडिया में जगह नही मिल पाती वह सभी खबरे ब्लाग के माध्यम से एक बड़ी पाठक संख्या तक पहूंच पाती है। आगे आपने ब्लागिंग और आर्थिक संसाधनों के एडंवास तरीको पर भी बात की। और बताया कि किस प्रकार से अब हिन्दी ब्लागर भी अच्छी आमदनी अपने ब्लाग के जरिये बना रहे है। इसके अलावा भी वह कई अन्य चर्चित मुद्दों पर भी जमकर बोले। आज के (11 फरवरी/स्थानीय) सभी अखबार यशवतं जी के ब्लागिंग पर दिए गए बयानो से भरे पड़े है। सेमिनार में आते ही यशवंत जी को पत्रकारों ने हाथो-हाथ लिया था। कार्यक्रम में बहुत सारे ब्लागर साथी अपने ब्लाग को चर्चित करने के तरीके भी यशवंत जी से पुछते रहे।
इसके बाद बेहद ही शर्मीली लेकिन अपने धारदार तेवर और सवेंदनात्मक लेखन के जरिये अपनी एक खास उपस्थिति को दर्ज कराने वाली भारत की चर्चित महिला पत्रकारों में से एक और मशहूर ब्लागर मनविंदर भिबंर जी कहा का की वह अभी ब्लागिंग की दुनिया में नई है लेकिन ब्लाग की अहमियत और असर क्या होता है आज ये सबको पता है। ब्लाग से उन सभी नये लिखने वालो का एक सार्थक मंच मिला है जो अच्छी लेखन क्षमता के बावजूद सामने नही आ पाए थे।
कार्यक्रम संचालन के लिए हमारे पास बहुत सारे नामों की एक लम्बी लिस्ट थी लेकिन आखिर में निर्णय ’हकबात’ सलीम अख्तर सिद्दीकी जी के पक्ष में गया। आपने प्रभावी तरीके से इस सेमिनार का संचालन किया और लोगों के सामने दिखाया कि वे एक अच्छे ब्लागर या पत्रकार ही नही बल्कि दक्ष संचालक की भूमिका भी खूब निभा सकते है। इस सेवा के लिए भी आप उनसे बिल्कुल सम्र्पक कर सकते है। वह बीच-बीच में ब्लागिंग के बारे में बताते हुए अपने पक्ष को भी सामने रख रहे थे।
कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाने के लिए ऋचा जोशी जी भी थी। ऋचा जी के बारे मे हम सब जानते है कि आपको पत्रकारिता विरासत में मिली है। आपके पिताजी का नाम दिग्गज पत्रकारो की लिस्ट में शुमार है, और आपने ’इर्द-गिर्द’ से अपनी एक खास उपस्थिति को दर्ज किया है। इस ब्लागिंग के भव्य सेमिनार में अन्य बहुत सारे ब्लागर साथियों ने अपना-अपना पक्ष रखा। आमंत्रित ब्लागर और पत्रकार साथियों के नाम और उन्होने क्या-क्या कहा ये सब बताने के लिए ही आठ-दस कड़ियो में अपनी बात कहनी होगी। लेकिन मुख्य बात ये है कि इस समारोह में मुख्य रूप से भारत की पहली हिन्दी ब्लागिंग पुस्तक का विमोचन भी किया गया। आप सबको साथियो को पुस्तक सहज ही उपलब्ध हो सकती है इसके लिए आप सम्र्पक कर सकते हैं। कार्यक्रम में सभी दोस्तो ने चित्र लिए है। जो हमें अगले कुछ दिनों में उपलब्ध हो जाएगें जिसे अगली पोस्टो में प्रकाशित किया जाएगा।

10 फरवरी को हिन्दी ब्लागरों का मेला मेरठ में


मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के प्रेमचंद सेमिनार हाल मे आयोजित हो रहा है, मेरठ का प्रथम ब्लागिंग सेमिनार एक लम्बी सूची ब्लागरों के कार्यक्रम में आने की मिल चूकी है। कार्यक्रम का निमन्त्रण पत्र निम्नवत् है। इस सेमिनार की अन्य सूचना आगे भी मिलती रहेगी



मेरठ में हो रहा है हिन्दी ब्लागिंग पर भव्य सेमिनार

हिन्दी ब्लागिंग अपना परचम दुनिया भर में लहरा कर अब जनसाधारण की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गई है। अनेक देश-प्रदेशों में हिन्दी ब्लागिंग को लेकर चर्चाए और सेमिनार होते रहे है। दिल्ली में तो अब हर महिने की ब्लागिंग को लेकर छोटे बड़े सेमिनार हो रहे हैं। इस कड़ी में अब मेरठ शहर का नाम भी जूड़ने वाला है। यहां जमा हो रहे है देश के नामचीन ब्लागर। मेरठ में ब्लागिंग के इस भव्य सेमिनार को आयोजित कर रही है चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी और रवि पब्लिकेशसं। कार्यक्रम यूनिवर्सिटी के प्रेमचंद सेमिनार हाल में 10 फरवरी को सायं 3 बजे होने जा रहा है। इस कार्यक्रम में हिन्दी ब्लागिंग को लेकर अपने विचार रखने के लिए देश भर से ब्लागर आ रहे है। अभी तक प्राप्त सूचना के आधार पर आमंत्रित ब्लागरों में मुख्य रूप से ’भड़ास’ के यशवंत सिंह जी, ’इर्दगिर्द’ से हरि जोशी जी, ’आजकल’ से ओमकार चौधरी जी, ’दिल की बात’ से डा. अनुराग आर्य, ’हकबात’ से सलीम अख्तर सिद्दीकी जी, ’पापुलर कलाम’ से पापुलर मेरठी जी आदि ब्लागर कार्यक्रम में सम्मिलित हो रहे है, इसके अतिरिक्त अन्य ब्लागर भी है जिनके आगमन की सूचना है। ’उड़नतश्तरी’ के समीरलाल जी इन दिनों भारत में है और उनका इस कार्यक्रम में आने का आश्वासन है लेकिन प्राप्त जानकारी के अनुसार अभी हाल ही में उनका स्वास्थ्य गड़बड़ा गया है। ईश्वर उनको जल्दी सेहतमन्द करे ताकी हम इस सेमिनार में उनको भी सून सके। कार्यक्रम में ब्लागिंग पर एक पुस्तक का विमोचन भी होना है। कार्यक्रम में मुख्य अतिथी के रूप में चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. एस. के. काक रहने वाले है। इसके साथ ही जागरण समूह के धीरेन्द्र मोहन गुप्ता जी का सानिध्य भी प्राप्त होने वाला है तथा मशहूर लेखक असलम जमेशदपुरी जी व रवि पब्लिकेशसं के मनेष जैन जी भी कार्यक्रम में उपस्थित रहेगें। इसके अलावा और भी हिन्दी ब्लागरों के आने की सूचना मिल रही है जैसे-जैसे उनके नाम प्राप्त होते रहेगें आपको सूचित किया जाता रहेगा। आपका भी मेरठ में ब्लागिंग के इस भव्य समारोह में स्वागत है।

जितेन्द्र चौधरी जैसा सर्मपण कहां से लाए

हिन्दी में ब्लॉगरों की भीड़ बढ़ती ही जा रही है। जिसको पता चल रहा है वो दौड़ा-दौड़ा आ रहा है। लेकिन बीते कल में ये बात न थी। हिन्दी ब्लॉगिंग की नींव में जो पत्थर गड़े हुए है उनमें से ही एक नाम जितेन्द्र चौधरी का आता है। 'बड़े भय्या' के नाम से लोग आपको सम्बोधित करते है, और आपने जो कुछ भी ब्लॉगिंग को माध्यम बनाकर हिन्दी भाषा के लिए किया है वो एक बड़े भय्या ही कर सकते है। बतौर एक सॉफ्टवेअर प्रोफेशनल होने के नाते आपने अपनी क्षमताओं का भरपूर उपयोग हिन्दी ब्लॉगिंग के योगदान के लिए किया है। हम देख रहे है हिन्दी में जो ब्लॉगर आ रहे है वो क्या तो पत्रकार हुए जा रहे है या व्यंगकार बनने का चस्का उनको भा गया है, और इसी चक्कर में सब अपने ब्लॉगिंग फैशन का निर्वाह कर रहे है।
लेकिन जीतू भाई अपने सर्मपण के साथ ब्लॉगिंग करते है, जो कुछ है जैसा है हरदम देने को तैयार और ऐसे ही आपकी दोस्त मण्डली है। हिन्दी ब्लॉगरों की संख्या को दस लाख पर पहुंचा कर ही छोड़ेगे। 'नारद' जैसे ब्लॉग ऐग्रीगेटर का जन्म कैसे हुआ है ये हर किसी ब्लॉगर को जानना चाहिए। तब हमें पता चलेगा कि आज हिन्दी में ब्लॉगिंग करना फूलों की सेज है, लेकिन कल यही काम लोहे के चने चबाने जैसा था। लोग मजे ले रहे है, लेकिन याद रखें राहे इतनी आसान न थी। इनको आसान बनाने में जीतू भाई जैसे और भी बहुत सारे ब्लॉगरों ने निस्वार्थ योगदान दिया है। अब हमने हिन्दी को इंटरनेट की भाषा बनाने की तरफ पहला कदम बढ़ाया है।
आज हम मजे से अपनी पोस्ट लिख कर सो जाते है लेकिन ये लोग कल के लिए नये-नये तरिकों और सुविधाओं को जुटाने की तरफ सोच रहे है। आप सब की जानकारी के लिए बताना उचित समझता हूं कि जीतेन्द चौधरी भी ऐसे हिन्दी ब्लॉगर है जो अपने हिन्दी ब्लॉग से ही पैसा भी कमा रहे है। उनके ब्लॉग पर फरवरी से अप्रैल तक दिखाऐ जाने विज्ञापनो से ही 100 डॉलर तक की आय बन जाती है। भारत में इस दिशा में और भी लोगो ने कदम बढ़ाया और कामयाब भी हुए है।
एक तकनीकी विशेषज्ञ का ब्लॉग रोचक और मनोंरजक भी हो सकता है ये बात जीतू भाई के ब्लॉग 'मेरा पन्ना' पर आसानी से देखी जा सकती है। आपने अपने बारे में बताते हुए अपने प्रोफाइल में एक पूरी किताब ही अपने बारे में लिख दी है। उसको पढ़ने के लिए आपके पास चार-पांच दिन का समय होना चाहिए। आप आजकल दूबई में क्रियाशील है लेकिन आपका जन्म कानपूर में हुआ था, और आपको कानपूर से प्यार दिवानगी की हद तक है। लेकिन दुबई की नफासत में आप इतने रमे हुए है कि कानपूर में धूल से आपको एलर्जी हो जाती है। लड़कियां आपकी सबसे अच्छी दोस्त है, लेकिन क्यो हैं ये शोध का विषय है।
जितेन्द्र जी कुछ मुद्दों पर बहुत भावूक होकर बोलते है कि- ''मेरा अपना विचार है कि हिन्दुस्तान का बँटवारा गलत था,हम जमीन का बँटवारा तो कर सकते है, लेकिन दिलों का, लोगों का और उनके इमोशन्स का बँटवारा नही कर सकते.'' आपको ब्लॉग लिखने के लिए कभी ड्राफ्ट का प्रयोग नही करते जो जी में आया लिख दिया। और बाद में सोचते है कि इससे बेहतर भी लिखा जा सकता था। और शायद इसीलिए आपने काफी सारी ऐसी पोस्टे भी लिख मारी जो लिखने की आवशयकता ही नही थी जैसे आपकी एक पोस्ट ''शेविंग क्रीम के विकल्प'' भी है। इसमें आप बताते है कि यदी आपके पास शेविंग क्रीम खत्म हो गई है तो आप क्या आजमा सकते है, फिर पता नही क्या-क्या नुस्खें जीतू भाई बता डालते है। ऐसे सीधा-सरल और सच्चा ब्लॉगर कहां देखने को मिलेगा। जो अपने मौलिक अनुभवों को भी अपनी पोस्ट बना देता हो। हम सब जानते है कि हिन्दी ब्लॉग लेखन में अपने अनूप भाई 'फुरसतीया' का व्यंग बहुत ही मौलिक और नये प्रयोग से भरा होता है। जीतू भाई पर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव दिखाई दिया। अपनी एक पोस्ट ''आप किस किस्म के ब्लॉगर है जी? '' ’’ में वे इनसे भी दो कदम आगे दिखाई देते है।
आप तकनीकी दक्षता में कितने आगे है इस बात का पता Gyan Dutt Pandey जी की एक टिप्पणी से चलता है- यह तो ब्लॉग का रंग रोगन ही बदल गया। हमें अचकचा कर लगा कि किसी और के ब्लॉग पर लैण्ड कर गये। रंग जम रहा है!
इस तरह के प्रयोग आपके ब्लॉग पर आम बात है। ऐसे कितने ब्लॉगर होगें जो सच में अपनी भाषा और देश के लिए इतने सर्मपण वाला जज्बा रखते हो। हिन्दी ब्लॉगिंग को इतना सरल और सुविधाजनक बनाने मे जितेन्द्र चौधरी जी का काम सलाम के लायक है। लेकिन भय्या ने अपने योगदान के साथ-साथ कुछ बुराइयां भी हिन्दी ब्लॉगिंग को भेंट की है जिनमें से एक है गुटबाजी। सिर्फ अपने साथ वालों के ब्लॉगों पर घूमना फिरना आजकल हिन्दी ब्लॉगिंग का नया तेवर है। सभी ब्लॉगर अपने-अपने गुट बनाने में लगें हुए हैं। आपके किसी साथी ने पोस्ट लिखी सारा गुट वहां जमा हो गया, और लग गए वाही-वाही में। '' तुम मुझे हाजी जी कहो, मैं तुम्हें हाजी जी कहूंगा-दुनिया हमें हाजी जी कहना शूरू कर देगी। ऐसे चलन को बढ़ाने में भी अपने जीतू भाई का योगदान अंश है। ये ब्लॉगिंग के लिए घातक प्रवृति है, और इसका जितना विरोध हो कम है। यदी कभी मन हुआ तो नये लिखने वालों के लिए '' बहुत सून्दर है '' कहकर चलते बनना और अपने याड़ी की शान में लम्बें कसीदें गुटबाजी को हवा देता है। लेकिन फिर भी मैं ये कहूंगा जितेन्द्र जी ने हिन्दी ब्लॉगिंग के लिए जितना काम किया है, उनसब में ऐसी बातों की कोई जगह नही हैं। क्योंकि हमें आने वाले दिनों में उनसे और भी आशाएं है।

अतः मैं फिर कहूंगा कि हिन्दी ब्लॉगरों पर ये तनकीद निगारी किसी जाति उद्देश्य या भावना से नही बल्कि उनके काम और लेखन पर एक विचार या राय भर है। अगली समीक्षात्मक पोस्ट मशहूर ब्लॉगर इरफान ''टूटी हुई बिखरी हुई'' पर पढ़ना ना भूले।


आलोक पुराणिक का ब्लॉग कबाड़खाना है

ब्लॉगिंग और कबाड़ का कुछ लेना देना नहीं है, लेकिन अपने बड़े भाई आलोक जी का ब्लॉग पूरा कबाड़खाना बना हुआ है, अब ये कबाड़ चुगने वाले पर निर्भर करता है कि वह यहां से मोती निकाल रहा है या बेकार की चीजे। कबाड़ की खासियत भी यही होती है कि उसमें दूर्लभ, बेशकीमती, और यूनिक चीजों का मिलना स्वाभाविक होता है और ये बात आलोक पुराणिक जी के ब्लॉग पर भी सटीक बैठती है। आलोक जी जाने-माने व्यंगकार है, जो अपना खुद का डोमेन लेकर ब्लॉग चलाते है, और आजकल अपनी पैनी धार को और भी पैना करने पर तुले हुए है।
आप तीखे तेवरों का इस्तेमाल करते हुए बचकर साफ निकलने की कला से बखूबी वाकिफ है। अभी तक के हिन्दी ब्लॉगरों में आप सबसे लाइव ब्लॉगर है जो प्रतिदिन के हिसाब से पोस्टे लिखते है, और प्रति घन्टे के हिसाब से पोस्ट देने की सम्भावना भी उनमे दिखाई देती है। हिन्दी ब्लॉगिंग में हर दूसरा ब्लॉगर अपने आपको पत्रकार सिद्ध करने पर तुला हुआ है। ऐसे में आलोक पुराणिक सर्वाधिक विश्वसनीय नाम है। राष्ट्रीय अखबारों पर आपकी पकड़ देखते ही बनती है, हिन्दी के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले दैनिक आपको विशेष जगह देते है, और आलोक जी अकसर नये-नये मुददों के साथ ठोका-पीटी करते हुए इनमे नुमाया रहते है।
आप अर्थशास्त्र पर अच्छी पकड़ रखते है और इसी के मास्ससाब है, दिल्ली कालेज में प्रोफेसरी करते है। वे पुराने जमाने के पी.एच.डी होगें ये बताने की जरूरत नहीं है। आज की हिन्दी में जो नयी तरह की भाषा का चलन बढ़ रहा है, उसमे आलोक पुराणिक का नाम लेना नहीं भूला जाएगा, और हिन्दी की ब्लॉगिंग में तो आप भाषा के एक नये प्रकार, और अजीबो-गरीब रव्वैय को आम करने पर उतारू है। आमतौर पर आलोक दूसरों की अच्छी पोस्ट पर 'धांसू च फांसू' कहना नहीं भूलते ऐसी और भी अनगिनत उपमाए आप न जाने कहां-कहां से लाते है। ये पहले ऐसे ब्लॉगर है जिसको लोग उसी भाषा में टिप्पणी देना चाहते है जिसे वह परोस रहा है। ''बहुत करारा आईटम लाये'' या फिर ''मस्त-मस्त पोस्ट'' या फिर ऐसे भी “क्र्कोघ्ह घ्ज्फ्द घ्ज्क्द द्द्फ्द्ग्र्ह्व घ्र्त्र्त्द्स्द फ्द्फ्ह्ग्फ्ह्ज घ्ह्ह्क्ज्द” अर्थात आपने क्या खूब लिखा है बधाई स्वीकारें , जैसी टिप्पणीया आपको आलोक जी की पोस्टें पर खिलखिलाती दिख जाएगी।
अपनी ही प्रकार की शैली का ब्लॉगर जिसने खुद अपनी तरह की भाषा को ब्लॉगिंग में मान्यता दिलाई। मशहूर ब्लॉगर Gyan Dutt Pandey जी आपके ब्लॉग के नियमित पाठक है वह आलोक जी की थकी हुई पोस्टों पर भी टिप्पणी करना नहीं भूलते। आलोक भाई मैथिली जी के बहुत बड़े प्रशंसक है। और कम्प्यूटर पर हिन्दी के तकनीकी विकास के योगदान में मैथिली जी के काम पर आपने शानदार पोस्टे लिखी है।
मैं आलोक जी को एक गुजरे जमाने से जानता हूं तब वह अपने मुछों वाले फोटो के साथ अपना कॉलम देते थे। आजकल तो क्लीन शेव नजर आते है, पहले आप अखबारों में जो तस्वीरे दिया करते थे, वे एक व्यंगकार का चुटीलापन लिए हुए गभ्भीरता की चाशनी के साथ नजर आती थी। आजकल आप, अपने बढ़िया टूथपेस्ट की खूबियों को दिखाने करने में लगे हुए है (वह अब क्लीन शेव के साथ कृत्रिम मुस्कूराहट वाली तस्वीरे ही देते है ) व्यंगकार होना बड़ी जिम्मेदारी का काम है, ये बात हम शरद जोशी जी या हरिशंकर परसाई या दूसरे नामी व्यंगकारों के काम से बखूबी समझ सकते है। शरद जोशी जी के व्यंग तो देश के प्रधानमंत्री की हवा भी निकाल देते थे। और ये काम सिर्फ एक व्यंगकार ही कर सकता है। इन महान व्यंगकारों का ये सलैक्टड काम था। बेहद चुनिंदा और सार्थक पर आजकल आलोक जी इस तरीके को भूल गए है। उनका यकीन अब क्वालिटी की बजाय क्वांटिटी की तरफ रहता है। धड़ाधड़ लिखने पर उतारू है, जैसा भी, जो भी दिखेगा, बस व्यंग कहना है जी, कुत्ता, बिल्ली, घोड़ा, हाथी, चिमटा, फूंकनी, बेलन, करछी जो हाथ आ जाए। इस चक्कर में व्यंग की मारक क्षमता तो हाथ से जाती ही है, साथ ही साथ पोस्ट बोझिल और उबाउ हो जाती है। व्यंग की लीद निकालने के इस तरीके को ब्लॉगिंग की हिंसक प्रवृत्ति कहना चाहिए।
मैं इस सबका ठिकरा आलोक जी के सर ना फोड़कर प्रसून जोशी के मत्थे मढ़ना चाहूंगा। प्रसून जोशी (प्रसिद्ध फिल्मी गीतकार, राइटर, विज्ञापन एजैसी के संचालक, आमिर खान के सबसे प्रिय, कोका कोला को नयी पहचान देने वाले और भारत में अपनी खास उपस्थिति को दर्ज करने वाला एक आम से खास बनने वाला व्यक्ति) ही वो आदमी है जिसको देखकर आलोक जी बिगड़ गए है। इस प्रसून के बच्चे ने जिस तेजी से कामयाबी पाई और कामयाबी के जो नए शार्टकट दिखाए वो किसी को भी बिगाड़ सकते है। बस शायद इन्हे देखकर ही अपने आलोक भय्या बिगड़ गए।
अब कर डाले कुछ आड़े-तिरछे काम, अशोक चक्रधर जी का दामन पकड़कर मंचीय कविता शूरू की, लेकिन वहां तो गलेबाजो और अदाकारों का कब्जा था। तो एक न चली, वापस हो लिए। फिर सुना की किसी टीवी कार्यक्रम के लिए प्रस्तोता होने जा रहे है, अब वो खबर भी पूरानी पड़ गई। आजकल धड़ाघड़ लिखकर अपने प्रशंसकों की संख्या कम करने पर लगे हुए है। लेकिन एक बात जो मैं बहुत अच्छे से जानता हूं कि जो आदमी ब्लॉगिंग को एक नयी दिशा देने की सार्मथ्य रखता हो वह अपनी धुरी पर लौटना भी बखूबी जानता होगा। हम अगर कल के किसी शरद जोशी या हरिशंकर परसाई की बात करते है, तो बहुत सम्भव है आज के आलोक पुराणिक की बात लोग कल करें।

(मेरा आलोक जी से प्रेम उतना ही बरकरार है, जितना कल था, उनके बहुत सारे प्रशंसकों में से, मैं भी एक हूं, और हिन्दी ब्लॉगरों पर ये तनकीदनिगारी किसी जाति उद्देश्य या भावना से नही बल्कि उनके काम और लेखन पर एक विचार या राय भर है। अगली समीक्षात्मक पोस्ट मशहूर ब्लॉगर जीतेन्द्र चौधरी ''मेरा पन्ना'' पर पढ़ना ना भूले। आपकी टिप्पणीयां मेरे लिए बेहद मूल्यवान है, जो अच्छा लिखने के लिए हमेशा प्रेरित करती रहती है।)