गुस्सा, अवसाद, हर्ष और रोमांच आजकल एकसाथ महसूस हो रहा है। गुस्सा इसलिये कि कोई कहने में नहीं है, अवसाद इसलिये कि मनचाहा हो नहीं रहा हर्ष इसलिये कि कितना कुछ नया कर पा रहा हूं और रोमांच इसलिये कि कुछ अनोखा जुड़ रहा है। भावनाओं को सलाम करता हूं। जितनी ज्यादा जीने के लिये सांसों का होना जरूरी है, उतना फिलिंग्स के उतार-चढ़ाव का होना जरूरी है। मग्न रहूं तो कोई क्या बिगाड़ लेगा।
गुस्सा, अवसाद, हर्ष और रोमांच आजकल एकसाथ महसूस हो रहा है। गुस्सा इसलिये कि कोई कहने में नहीं है, अवसाद इसलिये कि मनचाहा हो नहीं रहा हर्ष इसलिये कि कितना कुछ नया कर पा रहा हूं और रोमांच इसलिये कि कुछ अनोखा जुड़ रहा है। भावनाओं को सलाम करता हूं। जितनी ज्यादा जीने के लिये सांसों का होना जरूरी है, उतना फिलिंग्स के उतार-चढ़ाव का होना जरूरी है। इसे यूं ही न जाने दो!
ऐसे बहुत अच्छा लिखने वालों की हिन्दी ब्लागिंग में एक लम्बी श्रंृखला रही है। मैं यहां किस-किस का नाम लूं जिन्होने अलग-अलग प्रकार के लेखन का सृजन किया और अपने ब्लाग को बनाया तथा पढ़ने वालो को उनके ब्लाग के माध्यम से एक नये तरह के व्यक्तित्व को जानने समझने का मौका मिला। इसी के चलते हिन्दी ब्लागों की लोकप्रियता बढ़ी। ये हम सब जानते है कि हिन्दी ब्लागिग का भविष्य बेहद सम्भावनाओं से भरा हुआ है लेकिन ब्लागिंग के घटिया चलन और भीड़ के कारण जो संड़ाध आज यहां उठ रही है वो ना सिर्फ इसकी लोकप्रियता को घटायेगी बल्कि अच्छा पड़ने वालों को इससे दूर भी करेगी।
हमारा ब्लाग हमारी धरोहर होना चाहिये, हमारे घर की तरह साफ-सुथरा, कलात्मक। आमतौर पर यहां नये लिखने वाले और असाहित्यिक लोग टिप्पणीयों के मोहताज रहते है, छोटे-मोटे टोटके आपको कुछ दिन चर्चां में जरूर रख सकते है लेकिन आपका पाठक वर्ग खड़ा नही कर सकते है।
यहां प्योर ही और दूसरो को सुख और ज्ञान देने वाला कटैंट से भरा हुआ ब्लाग आपको नियमित पढ़ने वालो से जोड़े रख सकता हैं। आपका कटैंट ऐसा हो कि पढ़ने वाला उसे अपनी जरूरत में शामिल कर ले अर्थात कुछ ऐसा लिखिए जो दूसरों की जरूरत बन जाए।
यदि आप छपास की पीड़ा से त्रस्त है तो कृपया अपना मानसिक कूड़ा यहां ना फैलाए। हमारा ब्लाग हमारे लिये एक मौका है जब हम अपना परिचय दूसरों से करा रहे होते है तो दोस्तो हम इसे यूंहीं न जाने दे।
गुलज़ार ने आखिर ऐसा गीत क्यों लिखा होगा
डर लगता है तन्हा सोने में जी, दिल तो बच्चा है जी!गुलज़ार का लिखा ये गीत अभी हाल ही में रिलीज़ फिल्म इश्किया में हम लोगों ने सुना हैं। आपको क्या लगता है गुलज़ार ने इस तरह के गीत को लिखने से पहले क्या सोचा होगा?
दांत से रेशमी डोर कटती नहीं
उम्र्र कब की बरस के सुफेद हो गयी
कारी बदरी जवानी की छंटती नहीं
वल्लाह ये धड़कन बढ़ने लगी है
चेहरे की रंगत उड़ने लगी है
डर लगता है तन्हा सोने में जी
दिल तो बच्चा है जी, दिल तो बच्चा है जी
थोड़ा कच्चा है जी
किसको पता था, पहलू में रक़्खा, दिल ऐसा पाजी भी होगा
हम तो हमेशा समझते थे कोई हम जैसा हां जी ही होगा
हाय ज़ोर करे, कितना शोर करे,
बेवजह बातों में ऐवें गौर करे
दिल सा कोई कमीना नहीं
कोई तो रोके, कोई तो टोके
इस उम्र में अब, खाओगें धोखे़
डर लगता है इश्क करने में जी
दिल तो बच्चा है जी, दिल तो बच्चा है जी
थोड़ा कच्चा है जी
हां... दिल तो बच्चा है जी
ऐसी उदासी बैठी है दिल पे
हंसने से घबरा रहे हैं
सारी जवानी कतरा के काटी
बीड़ी में टकरा रहे है
दिल धड़कता है तो, ऐसे लगता है वो
आ रहा है यही, देखता ही ना हो
प्रेम की मारे कटार रे
तौबा ये लम्हें, घटते नही क्यों
आंखों से मेरी, हटते नही क्यों
डर लगता है खुद से कहने में जी
दिल तो बच्चा है जी, दिल तो बच्चा है जी
थोड़ा कच्चा है जी
दिल तो बच्चा है जी
बोरिंग ब्लॉगों से परे की बात
सरदारः
एक सरदार टैक्सी ड्राइवर
दो सरदार कारपेंटर
तीन सरदार शेरे पंजाब ढाबा
चार सरदार ट्रांसपोर्ट कम्पनी
पांच सरदार प्यारे
मराठाः
एक मराठा बस कंडक्टर
दो मराठे कबड्डी प्लेयर
तीन मराठे अचार फैक्ट्री
चार मराठे थियेटर ग्रुप
पांच मराठे शिव सेना शाखा
भैयनः
एक भैया दूधिया
दो भैयन चना जोर गर्म (या पानी पूरी) विक्रेता
तीन भैयन हलवाई शॉप
चार भैयन अखाड़ा
बारह भैयन छोटा परिवार सुखी परिवार
कश्मीरीः
एक कश्मीरी नाव वाला
दो कश्मीरी शिकारे वाला
तीन कश्मीरी टूरिस्ट एजेन्सी
चार कश्मीरी कारपेट फैक्ट्री
पांच कश्मीरी जमायतेदहशतगर्दी
बंगालीः
एक बंगाली रवीन्द्र संगीत गायक
दो बंगाली रसगुल्ला-सन्देश शॉप
तीन बंगाली ब्लैक एण्ड वाईट फिल्म निर्माता
चार बंगाली मर्क्सिस्ट मूवमेंट
पांच बंगाली मोहन बगान स्र्पोट ग्रुप
मलयालीः
एक मलयाली वेटर
दो मलयाली नारियल पानी शॉप
तीन मलयाली गल्फ जॉब रैकेट
चार मलयाली बोट रेस
पांच मलयाली मलयालम फिल्म इन्डस्ट्री
तमिलः
एक तमिल चन्दन लकड़ी स्मगलर
दो तमिल आत्मघाती बम दस्ता
तीन तमिल शास्त्रीय संगीत स्कूल
चार तमिल उडूपी रेस्टोरेंट चेन
पांच तमिल जयललिता फैन क्लब
गोवानीः
एक गोवानी रेमो फर्नान्डिज
दो गोवानी टूरिस्ट ट्रांसपोट कम्पनी
तीन गोवानी फेनी डिस्लिरी
चार गोवानी फुटबाल क्लब
पांच गोवानी ऑल नाइट ड्रिंक्स-डांस पार्टी
बिहारीः
एक बिहारी लालू प्रसाद यादव
दो बिहारी लोकल एम.एल.ए. के दायें-बायें
तीन बिहारी बूथ कैप्चरिंग स्कवायड
चार बिहारी कास्ट किलिंग
पांच बिहारी राज्य की सम्पूर्ण साक्षरता
सिन्धीः
एक सिन्धी जनरल स्टोर
दो सिन्धी डुप्लीकेट गुड्स शॉप
तीन सिन्धी स्मगल्ड गुड्स शॉप
चार सिन्धी करन्सी रैकेट
पांच सिन्धी पापड़ फैक्ट्री
गुजरातीः
एक गुजराती मुम्बई लोकल ट्रेन में शेयर दलाल
दो गुजराती मुम्बई लोकल ट्रेन में सियासी झड़प
तीन गुजराती मुम्बई लोकल ट्रेन में गुजराती समाज सभा
चार गुजराती मुम्बई लोकल ट्रेन में रमी
पांच गुजराती मुम्बई लोकल ट्रेन में भजन मण्डली
राजस्थानीः
एक राजस्थानी टूरिस्ट गाइड
दो राजस्थानी राज-मिस्त्री
तीन राजस्थानी ढोर डंगर विक्रेता
चार राजस्थानी कठपुतली कलाकार
पांच राजस्थानी जैसलमेर डांस ड्रामा ग्रुप
अगर बात जमें तो बताए जरूर।
वसीम की शाइरी दर्द की शाइरी है
शराफत और सादगी के साथ अदबनवाज़ी का अगर कोई नाम हो सकता है तो आप वसीम बरेलवी को जानिये। आज के दौर के मशहूरो-मारुफ शायरों में आपका शुमार होता है। आपकी शायरी ने सुनने और पढ़ने वालों को अहसासों की एक ऐसी सौगात दी है जिसकी जगह उनके दिलों में हैं। अपनी शायरी में जबान की सादगी और सोच में जिन्दगी के आम मसलों और सरोकारों से गजल को जोड़ कर वसीम साहब पेश किया है। आज हमारे दौर को जिस शायरी की जरूरत है, वसीम साहब ने अपने कलाम में उसी आवाज को बुलन्द किया हैं। आपके बारे में मशहूर शायर ‘फिराक’ गोरखपुरी ने कहा था कि- मेरा महबूब शाइर ‘वसीम बरेलवी’ है। मैं उससे और उसके कलाम दोनों से मुहब्बत करता हूं। ‘वसीम’ के अशआर से मालूम होता है कि ये महबूब की परस्तिश में भी मुब्तिला रह चुके हैं। वसीम के खयालात भौंचाल की कैफियत रखते हैं। वसीम के कलाम में आगही और शऊर की तहों का जायजा है और ऐसा शऊर और आगही कैफो-सुरूर का गुलदस्ता है। यह अकसर बातचीत से बुलन्द होकर काइनात का रंगीनियों और दिलकशियों से लुत्फ हासिल करते हैं। दरअसल शाइरी भी वही है, जो अपने वुजूद में हमें जिन्दगी की नजदीकतर चीजों का एहसास दिलाती है। ‘वसीम’ की शाइरी दर्द की शाइरी है।
आज उर्दू शाइरों में वसीम बरेलवीं का नाम आज बुलन्दीयों पर है। आपके बिना उर्दू मुशाइरों में एक अधुरापन सा रहता है। आपने अपनी शाइरी में नये-नये प्रतीको और बिम्बों के जरीये से मौजूदा हालात की परेशानीयों पर बहुत ही सहज और सरल ढंग से लिखा है। आपकी गजलों अनेक गायक गा चुके हैं और आपके अशआर लोगों को जबानी याद हैं।
मंसूर उस्मानी साहब ने एक बार वसीम साहब के बारे में कहा था कि- कभी-कभी ऐसा लगता है कि ये शायरी शब्द और एहसास का ही रिश्ता न होकर हमारे आँसुओं की एक लकीर है जो थोड़े-थोड़े अर्से के बाह हर युग में झिलमिला उठती है और इस झिलमिलाहट में जब-तब देखा गया है कि किसी बड़े शायर का चेहरा उभर आता है। इस चमक का नाम कभी फैज था, कभी फिराक था, कोई चेहरा दुष्यन्त के नाम से पहचाना गया, किसी को जिगर कहा गया। हमारे आज के दौर में आँसुओं की ये लकीर जहाँ दमकी है, वहीं वसीम बरेलवी का चेहरा उभरा है। इन्होंने अपने शायरी में जिस तरह दिल की धड़कन और दिमाग की करवटों को शब्दों के परिधान दिये गये हैं वह अपने आप में एक अनूठी मिसाल है। आँसू को दामन तक, जज्बातों को एहसास तक और ख्वाबों के ताबीर तक पहुँचाने में जितना वक्त लगता है उससे भी कम समय में वसीम साहब की गजलें वक्त के माथे की तहरीर बन जाती हैं।
पिछले दिनों आपको प्रथम फिराक गोरखपुरी अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया है। जिसमें 51,000 रुपए का नकद पुरस्कार और एक प्रशस्ती पत्र प्रदान किया। पुरस्कार ग्रहण करने के बाद वसीम साहब ने कहा कि हमारे समाज को पाश्चात्य संस्कृति से लगातार खतरा बना हुआ है। भविष्य की लड़ाइयां जमीन या इलाके के लिए नहीं, बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व के लिए लड़ी जाएंगी। गालिब, मीर और नजीर के शहर ने उन्हें महान सम्मान से नवाजा है। यह पुरस्कार मेरे लिए इम्तिहान हैं।
आजकल आप बरेलवी रूहेलखंड विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के प्रमुख हैं और वह कला संकाय के डीन भी रह चुके हैं। आपकी उर्दू शायरी पर आधा दर्जन से ज्यादा किताबे आ चूकी हैं और कई फिल्मों और टीवी धारवाहिकों में उनके गीत लिए गए हैं।
कुछ ऐसे हुआ फरिदाबाद का ब्लागर सम्मेलन
खुद पर यकीन करना तो सिखिए
खुद पर विश्वास करना ऐसा है, जैसे, मन चाही चीज़ हासिल हो जाना। नौकरीपेशा लोग महीने की पहली तारिख की प्रतिक्षा में रहते हैं, मजदूर शाम ढले अपनी मजदूरी की प्रतिक्षा में, दुकानदार माल बिकने के इंतजार में रहता है। हम सब लोग किसी ना किसी वजह से दूसरों को अपनी कामयाबी का आधार मानकर चलते हैं। हमने अपना यकिन अपने आप से हटाकर, दूसरों पर लगा रखा है। अगर आपने सफलता को लक्ष्य बना रखा है, तो दांव भी अपने ऊपर ही खेलना हो। आप खुद पर यकीन करना सीखिए। अपने आप को बताइए की कोई भी कार्य आपके लिए असम्भव नहीं है। क्योंकि जो सफलता आप अपने लिये चाहते हैं, उसके प्रक्ट्रिकल के लिये हमने दूसरों को कैसे चुन लिया। सफलता, जिसका अर्थ प्रत्येक व्यक्ति अपनी जरुरतों के हिसाब से लगाता है। किसी के लिये सफल होना बहुत अधिक पैसा होना होता है, किसी के लिए शौहरत और मान-सम्मान सफलता है, किसी के लिये शीर्ष पर पहुँचना सफलता है। लक्ष्य कुछ भी हो सकता है। सफलता यदि आपके लिए अभी तक असम्भव थी, तो ये मानिए की अब आप सफल होकर ही रहेंगे। आपका खुद को दिलाया गया यकिन सबमें अनमोल धरोहर बन जाता है आपके लिए। हमने जिस प्रकार सुबह उठकर पेस्ट करने को एक सरल प्रक्रिया मान रखा है, अपने जुते पाॅलिश करना या दूसरे ऐसे ही कुछ और काम, जिनमें कोई कठिनाई हमें नज़्ार नहीं आती और हम आसानी से इन कामों को कर लेते हैं। ऐसे ही कोई भी अन्य असम्भव प्रतीत होने वाला कार्य भी हम केवल विश्वास के बल पर सरलता से कर सकते हैं।
