मानवीय भावनाओं और अनुभूतियों से परिचित कराता कन्हाईलाल निर्देशित 'पेबेट'


सावित्री हेस्नाम भारतीय रंगमंच की एक दुर्लभ अभिनेत्री हैं मंच पर उन्हें देखना एक ऐतिहासिक अनुभव है. देखते हुए दर्शक अपनी ही मानवीय भावनाओं और अनुभूतियों से परिचित होता है. सुख, दुख पीड़ा, उल्लास, भय, आशंका न जाने कितने भाव कुछ अंतराल में ही उनके चेहरे से गुजरते हैं और वह इतनी सहजता से होता है कि आप चौंकते भी हैं और मुग्ध भी होते हैं. 

इसी सावित्री हेस्नाम ने अपने जीवन संगी प्रसिद्ध निर्देशक कन्हाईलाल को पिछले वर्ष खो दिया. दोनों ही प्रतिभा के साहचर्य ने भारतीय रंग जगत को ऐसी रंगभाषा दी जिसमें शाब्दिकता से परे की संप्रेषणीयता थी और इस रंगभाषा में पूर्वोत्तर के साथ-साथ वैश्विक मानवीय जगत का आख्यान रचा गया जो जितना देशिक था उतना ही सार्वभौमिक भी. 

रानावि में लीविंग लीजेंडस शृंखला में सावित्री जी ने अपने अभिनय की खूबियों और बारीकियों को बताया और शाम में कन्हाईलाल जी को श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत ‘पेबेट’ में इन्हीं सिद्धांतों का मंचीय निरूपण भी दिखाया.

‘पेबेट’ कन्हाईलाल की शुरुआती प्रस्तुति है जहां से इनकी रंगभाषा ने निर्णायक मोड़ लिया. यह प्रस्तुति एक रूपक कथा है जिसमें एक दुर्लभ पक्षी पेबेट, जो विलुप्ति के कगार पर है, को वर्षों बाद देखा जाता है. एक बिल्ली की नजर पेबेट के इस परिवार पर है. 

पहले तो मां पेबेट जिसकी भूमिका सावित्री जी ने की है अपने बच्चों को बचाने के लिए बिल्ली की ठकुरसुहाती करती हैं लेकिन बच्चे जब बड़े होते हैं तो वह उनको संगठित करके बिल्ली का प्रतिकार कर उसे भगा देती है. इस  नाटक में मां पेबेट एक स्वप्न देखती है जो हमारी सभ्यता की समीक्षा है जिसमें ताकतवर शक्तियां अपनी महीन चालों से जनता को आपस में ही भिड़ा देती है.

रंगभाषा की सांकेतिकता में इतना यथार्थ है कि आप विचलित हो जाते हैं. प्रस्तुति देखते हुए यह भी लगता है कि मनुष्य कैसे अपनी पारिस्थितिकी से अलग हो गया है, उसे लगता है कि वह केवल मनुष्य के साथ रहता है जबकि  बहुत से जीवों और पर्यावरण से घिरा रहता है. इस पारिस्थितिकी के बारीक अवलोकन से ही अभिनेता पक्षियों के पैटर्न को अपने अभिनय में उतार पाते हैं. 

एनडीटीवी की खबर के अनुसार, 
नाटक पूर्वोत्तर का है, जो अभी फिर एक बार हिंसा की चपेट में है. यह स्थिति को उभारता है, पूरे यथार्थ और पक्षधरता के साथ. यह नाटक बताता है कि कला में राजनीति या पक्षधरता जितनी अंतर्निहित होती है उतनी ही सुंदर होती है.

वेरा बरज़ाक स्नाइडर की प्रस्तुति ‘ए स्ट्रेंजर गेस्ट’
इजराइल की ‘ए स्ट्रेंजर गेस्ट’ शांत और गहरी प्रस्तुति है जो एक खास स्थिति में फंसे परिवार के सदस्यों के व्यक्तिगत और आपसी संबंधों में और उस स्थिति के प्रति उनकी प्रतिक्रिया को दर्ज करती है. मंच की सज्जा किसी मध्य वर्ग के ड्राइंग रूम की है जिसमें दर्शकों की तरफ खिड़कियां हैं जिनके जरिए उनकी स्थिति को दर्शक देख पाता है.  

ये खिड़कियां और उन पर पात्रों की गतिविधि से स्पष्ट होता है कि उनके बीच कोई अभिन्न अनुपस्थित है और उसकी अनुपस्थिति नाटक में पात्रों की बेचैनी में दर्ज होती है. एक परिवार में दो बहनें हैं, मां बीमार है.  पिता, मां की खबर लेकर आते हैं. तीनों इस स्थिति में विचलित हैं और वे अपनी स्मृतियों में जाते हैं जो प्रत्येक के लिए अलग-अलग हैं. खाने की टेबल पर उनका व्यवहार, उनकी हताशा और आशंका से उपजा है. 

मानवीय व्यवहारों सजीव और संवेदनशील ब्यौरा इस प्रस्तुति को इसे खास बना देता है जबकि नाटक में घटनाएं नहीं के बराबर हैं.  प्रकाश और अभिनेताओं की गतियों का खेल उनके द्वंद्व को और गाधा बना देता है. नाटक के अंत में सभी पात्र नेपथ्य में चले जाते हैं और एक चीख सुनाई देती है. दर्शक अंधेरे में बैठा स्तब्ध रह जाता है.
वासू वंडरफुल 5 मिनट 56 सेकन्ड में बनी हुई एक डाक्यूमेंट्री शार्ट फिल्म है। फिल्म वासूदेव मिश्रा के जीवन पर आधारित घटनाओं से प्रेरित है। अपने पिता के सरकारी कर्जें को उतारने के लिए गोंडा जैसे छोटे शहर से निकला वासू दिल्ली महानगर में आकर रोजगार की तलाश करता है, लेकिन बेरहम दिल्ली उससे ठेला चलवाने, मजदूरी करने, बोझा ढोने जैसे कामों में लगाती हैं। जब वासू मजदूरी करते हुए खारी बावली की गलियों से परिचित होता है तब समझ जाता है कि जिन्दगी यहीं से उसके लिए नये रास्तें खोलेगी। वासू यहीं पर सूखे मेवे की छिलाई और ढुलाई करने लगता है और यहीं से बादाम के व्यापार को समझता हैं। बादाम के एक बड़े व्यापारी के तौर पर अपनी पहचान बनाने वाला एक साधारण आदमी एशियाभर में मशहूर बादाम के नगर करावल नगर को बसाता है, जहां से आज दुनिया भर में बादाम भेजा जाता हैं।


द स्पिरिचुअल कनेक्ट: ए ट्रिब्यूट टू माँ

नदियों से बलखाते रस्तों पर,


डूबते-उबरते चलते-चलते!

कभी गर्मी की तपती धूपों में,

और सर्दी के घने कोहरे में कभी!

तू मुझको नज़र आ जाती है!



नुसरत की हर क़व्वाली में,

हर तान पे और हर एक ताली में!

कभी अनहद की हद के परे,

हवा में सूफ़ी नक्काशी सी कभी!

तू मुझको नज़र आ जाती है!



यूँ तो बेरंग हैं ख़्वाब मेरे!

आँखों से भी है नूर जुदा!

कभी होली के रंगीं मौसम में,

दीवाली के रोशन दीये सी कभी!

तू मुझको नज़र आ जाती है!



दुनियावी रिश्तों से दूर कहीं!

रूह के रिश्तों की दुनिया में!

कभी टिमटिमाते तारों में,

रूप बदलते बादल में कभी!

तू मुझको नज़र आ जाती है!



अंतिम शैय्या पर सोयी हुई,

आगोश-ए-आग में खोई हुई!

कभी हाथों की अभागी लकीरों में!

माथे की अधूरी तकदीरों में कभी!

तू मुझको नज़र आ जाती है!



अपने हाथों से तुझे जलाया था!

तेरी राख भी चुन के लाया था!

कभी चलती-फिरती हँसती-खिलती!

मिट्टी के बिखरे फूलों सी कभी!

तू मुझको नज़र आ जाती है!



तेरे संग जिसमें गोता लगाया था!

उसी गंगा में तुझे मिला आया था!

कभी उसकी निर्मल धारा में!

और उसमें घुले बालू में कभी!

तू मुझको नज़र आ जाती है!



जो जाते हैं फिर आते नहीं!

पर यादें कहाँ कहीं जाती हैं?

कभी मीठी गालियाँ देती हुई!

और लाड लड़ाती हुई कभी!

तू मुझको नज़र आ जाती है!



मौजूद नहीं तू ज़ाहिर में!

फिर भी मुझे राह दिखाती है!

कभी नेकी पर मुझे चलाती हुई!

बदी से बचाती हुई कभी!

तू मुझको नज़र आ जाती है!



यूँ तो तेरी रूह मेरे जिस्म में बसती है!

पर दीदार को जब अँखियाँ तरसती हैं!

कभी देखता हूँ आईने में अक्स तेरा!

आँखें बंद कर लेता हूँ कभी!

तू मुझको नज़र आ जाती है!



आई लव यू!

माँ

तेरे गम का नमक मीठा लगा!

तुमने भी कहीं जरूर पढ़ा होगा, बुरे वक्त की अच्छी बात ये है कि वो ज्यादा देर रुक नहीं सकता। मैं कहूंगा, तो कहोगे दिलासा मत दो तुम दिलासे लेना भी मत, बस! एक जोर की ऐड़ लगाकर यह खाई पार कर लेना। जो अंधेरों से भरी रात है वो असल में चांदनी फिज़ा की महक है, जो थोड़ी देर बाद ही रोशनी का पैगाम लेकर सूरज के रथ पर आ रही है। अपने आसूंओं को यूं जाया मत किया करो। मीठा है तुम्हारे आंसूओ का नमक। मैंने चखा है, इसलिए बता रहा हूँ। मुझे शुगर कराओगी क्या?

गुलजार का कलाम नही हो सकता

नया तलाश करने की तलाश में आसमान का एक छोर उठाकर देखा तो पाया अभी तो बहुत सारा आसमान बाकि है। ये अलग बात कि किसका कितना बड़ा आसमान हो सकता है। आसमान में कमंद डालने वालों का सफर ज्यूं का त्यंू बना हुआ है।

जब हमने अपनी घड़ी की सूई को देखा तो कुछ साल और यूंही सेल बदलते हुए निकल गए। घड़ी बंद रहती है आजकल। किसी दिन नया सेल लाकर बदलना है। चायनीज जूते पहनकर बुड्ढों का लुक भी जवान नज़र आता है। जुमें की पेठ से चायनीज जुते खरिदे जा सकते है। ये काला खिज़ाब लगाने के जैसा ही है। एग्रीगेटर खुले नही अभी तक पुराने वाले जबकि नये अपनी पहचान बनाने में लगे हुए है।

फेसबुक पर अब वो भी है जो नही हो सकते थे कभी। सामने कचैरीयां बेचने वाला हलवाई और बराबर में आटे वाले का प्रोफाइल अगर किसी दिन दिख जाए तो शयद अब मैं हैरान ना रहूं। जुकाम से पिछले आठ दिनों से परेशन हूं। रूमाल निकालते हुए झेंप सी आती है। इस सीजन की ठंड तो चलती बनी। तीनों नये कोट जलवागर हुए बिना ही पैक कर दिये मेडम ने। पुरानी जर्सीयां भारी पड़ी नये कोटो पर। खत्म हो रहा है वैसलीन का डिब्बाए नया लाउं या ना असमंजस बना हुआ है। एकता कपूर की हवा फुस्स हो गयी।

सब के सभी प्रोग्रामों पर क्षेत्रीय जबानों का बोलबाल है। इलीट भी आजकल यही देख रहा है। प्रसून का भोंडापन कभी भी गुलजार का कलाम नही हो सकता। जुकाम के चलते सर दर्द कर रहा हैए और में बोर भी हो रहा हूं। पोस्ट अब पब्लिश हो जानी चाहिये।