बोरिंग ब्लॉगों से परे की बात

सरदारः
एक सरदार टैक्सी ड्राइवर
दो सरदार कारपेंटर
तीन सरदार शेरे पंजाब ढाबा
चार सरदार ट्रांसपोर्ट कम्पनी
पांच सरदार प्यारे


मराठाः
एक मराठा बस कंडक्टर
दो मराठे कबड्डी प्लेयर
तीन मराठे अचार फैक्ट्री
चार मराठे थियेटर ग्रुप
पांच मराठे शिव सेना शाखा



भैयनः
एक भैया दूधिया
दो भैयन चना जोर गर्म (या पानी पूरी) विक्रेता
तीन भैयन हलवाई शॉप
चार भैयन अखाड़ा
बारह भैयन छोटा परिवार सुखी परिवार



कश्मीरीः
एक कश्मीरी नाव वाला
दो कश्मीरी शिकारे वाला
तीन कश्मीरी टूरिस्ट एजेन्सी
चार कश्मीरी कारपेट फैक्ट्री
पांच कश्मीरी जमायतेदहशतगर्दी



बंगालीः
एक बंगाली रवीन्द्र संगीत गायक
दो बंगाली रसगुल्ला-सन्देश शॉप
तीन बंगाली ब्लैक एण्ड वाईट फिल्म निर्माता
चार बंगाली मर्क्सिस्ट मूवमेंट
पांच बंगाली मोहन बगान स्र्पोट ग्रुप



मलयालीः
एक मलयाली वेटर
दो मलयाली नारियल पानी शॉप
तीन मलयाली गल्फ जॉब रैकेट
चार मलयाली बोट रेस
पांच मलयाली मलयालम फिल्म इन्डस्ट्री



तमिलः
एक तमिल चन्दन लकड़ी स्मगलर
दो तमिल आत्मघाती बम दस्ता
तीन तमिल शास्त्रीय संगीत स्कूल
चार तमिल उडूपी रेस्टोरेंट चेन
पांच तमिल जयललिता फैन क्लब



गोवानीः
एक गोवानी रेमो फर्नान्डिज
दो गोवानी टूरिस्ट ट्रांसपोट कम्पनी
तीन गोवानी फेनी डिस्लिरी
चार गोवानी फुटबाल क्लब
पांच गोवानी ऑल नाइट ड्रिंक्स-डांस पार्टी



बिहारीः
एक बिहारी लालू प्रसाद यादव
दो बिहारी लोकल एम.एल.ए. के दायें-बायें
तीन बिहारी बूथ कैप्चरिंग स्कवायड
चार बिहारी कास्ट किलिंग
पांच बिहारी राज्य की सम्पूर्ण साक्षरता



सिन्धीः
एक सिन्धी जनरल स्टोर
दो सिन्धी डुप्लीकेट गुड्स शॉप
तीन सिन्धी स्मगल्ड गुड्स शॉप
चार सिन्धी करन्सी रैकेट
पांच सिन्धी पापड़ फैक्ट्री



गुजरातीः
एक गुजराती मुम्बई लोकल ट्रेन में शेयर दलाल
दो गुजराती मुम्बई लोकल ट्रेन में सियासी झड़प
तीन गुजराती मुम्बई लोकल ट्रेन में गुजराती समाज सभा
चार गुजराती मुम्बई लोकल ट्रेन में रमी
पांच गुजराती मुम्बई लोकल ट्रेन में भजन मण्डली



राजस्थानीः
एक राजस्थानी टूरिस्ट गाइड
दो राजस्थानी राज-मिस्त्री
तीन राजस्थानी ढोर डंगर विक्रेता
चार राजस्थानी कठपुतली कलाकार
पांच राजस्थानी जैसलमेर डांस ड्रामा ग्रुप


अगर बात जमें तो बताए जरूर।

वसीम की शाइरी दर्द की शाइरी है

शराफत और सादगी के साथ अदबनवाज़ी का अगर कोई नाम हो सकता है तो आप वसीम बरेलवी को जानिये। आज के दौर के मशहूरो-मारुफ शायरों में आपका शुमार होता है। आपकी शायरी ने सुनने और पढ़ने वालों को अहसासों की एक ऐसी सौगात दी है जिसकी जगह उनके दिलों में हैं। अपनी शायरी में जबान की सादगी और सोच में जिन्दगी के आम मसलों और सरोकारों से गजल को जोड़ कर वसीम साहब पेश किया है। आज हमारे दौर को जिस शायरी की जरूरत है, वसीम साहब ने अपने कलाम में उसी आवाज को बुलन्द किया हैं। आपके बारे में मशहूर शायर ‘फिराक’ गोरखपुरी ने कहा था कि- मेरा महबूब शाइर ‘वसीम बरेलवी’ है। मैं उससे और उसके कलाम दोनों से मुहब्बत करता हूं। ‘वसीम’ के अशआर से मालूम होता है कि ये महबूब की परस्तिश में भी मुब्तिला रह चुके हैं। वसीम के खयालात भौंचाल की कैफियत रखते हैं। वसीम के कलाम में आगही और शऊर की तहों का जायजा है और ऐसा शऊर और आगही कैफो-सुरूर का गुलदस्ता है। यह अकसर बातचीत से बुलन्द होकर काइनात का रंगीनियों और दिलकशियों से लुत्फ हासिल करते हैं। दरअसल शाइरी भी वही है, जो अपने वुजूद में हमें जिन्दगी की नजदीकतर चीजों का एहसास दिलाती है। ‘वसीम’ की शाइरी दर्द की शाइरी है।

आज उर्दू शाइरों में वसीम बरेलवीं का नाम आज बुलन्दीयों पर है। आपके बिना उर्दू मुशाइरों में एक अधुरापन सा रहता है। आपने अपनी शाइरी में नये-नये प्रतीको और बिम्बों के जरीये से मौजूदा हालात की परेशानीयों पर बहुत ही सहज और सरल ढंग से लिखा है। आपकी गजलों अनेक गायक गा चुके हैं और आपके अशआर लोगों को जबानी याद हैं।
मंसूर उस्मानी साहब ने एक बार वसीम साहब के बारे में कहा था कि- कभी-कभी ऐसा लगता है कि ये शायरी शब्द और एहसास का ही रिश्ता न होकर हमारे आँसुओं की एक लकीर है जो थोड़े-थोड़े अर्से के बाह हर युग में झिलमिला उठती है और इस झिलमिलाहट में जब-तब देखा गया है कि किसी बड़े शायर का चेहरा उभर आता है। इस चमक का नाम कभी फैज था, कभी फिराक था, कोई चेहरा दुष्यन्त के नाम से पहचाना गया, किसी को जिगर कहा गया। हमारे आज के दौर में आँसुओं की ये लकीर जहाँ दमकी है, वहीं वसीम बरेलवी का चेहरा उभरा है। इन्होंने अपने शायरी में जिस तरह दिल की धड़कन और दिमाग की करवटों को शब्दों के परिधान दिये गये हैं वह अपने आप में एक अनूठी मिसाल है। आँसू को दामन तक, जज्बातों को एहसास तक और ख्वाबों के ताबीर तक पहुँचाने में जितना वक्त लगता है उससे भी कम समय में वसीम साहब की गजलें वक्त के माथे की तहरीर बन जाती हैं।

पिछले दिनों आपको प्रथम फिराक गोरखपुरी अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया है। जिसमें 51,000 रुपए का नकद पुरस्कार और एक प्रशस्ती पत्र प्रदान किया। पुरस्कार ग्रहण करने के बाद वसीम साहब ने कहा कि हमारे समाज को पाश्चात्य संस्कृति से लगातार खतरा बना हुआ है। भविष्य की लड़ाइयां जमीन या इलाके के लिए नहीं, बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व के लिए लड़ी जाएंगी। गालिब, मीर और नजीर के शहर ने उन्हें महान सम्मान से नवाजा है। यह पुरस्कार मेरे लिए इम्तिहान हैं।
आजकल आप बरेलवी रूहेलखंड विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के प्रमुख हैं और वह कला संकाय के डीन भी रह चुके हैं। आपकी उर्दू शायरी पर आधा दर्जन से ज्यादा किताबे आ चूकी हैं और कई फिल्मों और टीवी धारवाहिकों में उनके गीत लिए गए हैं।

कुछ ऐसे हुआ फरिदाबाद का ब्लागर सम्मेलन

कार्यक्रम की जानकारी तो नुक्कड़ ब्लाग से मिल गयी थी, बाद में मैंने अविनाश जी से सम्पर्क बनाया। तब कार्यक्रम में जाने का इरादा पक्का किया। 12 की सुबह ही मैं मेरठ से फरिदाबाद के लिये निकल पड़ा क्योंकि इस ब्लागर सम्मेलन को 10:30 पर शुरू होना था, इसलिये समय से पहुंचना जरूरी था। लगभग 10:15 पर में सैक्टर 17 पहुंच गया। वहां पहुंचते ही साहित्य शिल्पी के राजीव रंजन जी को फोन लगाया, एक्जेट लोकेशन पता करने के लिये। उन्होने मार्डन पब्लिक स्कूल की सही स्थिति से मुझे बताई।
ये वहां का एक बड़ा विद्यालय था। स्कूल के बाहर ही एक बड़ा बैनर कार्यक्रम के सम्बध में लगा हुआ था। स्कूल में दाखिल होने पर रिसेपशन से पता किया कहां पर कार्यक्रम है, वहां से एक व्यक्ति मुझे हिन्दी सभागार में ले गया। बाहर ही राजीव रंजन जी स्वंय मेहमानो का स्वागत कर रहे थे। उन्होने बहुत ही जोश और स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया और हाल की तरफ ले गए। आगे हमारे अन्य ब्लागर मित्र जो साहित्य शिल्पी तथा अन्य बलागों से भी जुड़े है मिले सभी पलकें बिछाए हुए मिले। ये मेरी राजीव रंजन और दूसरे दोस्तो से पहली मुलाकात थी। हाल में पहुंचकर देखा तो वह एक बड़ा कक्ष था, जहां स्लाइड प्रजेंटेशन पहले से ही चल रही थी। बहुत सारे ब्लागर बंधु कार्यक्रम की शोभा बड़ा रहे थे। कार्यक्रम अभी शुरू नही हुआ था।
मैंने अपना स्थान लिया। बराबर में ही सूलभसतरंगी जी बैठे हुए थे, जो गुड़गांव से आए हुए थे और दूसरी और हसते रहो वाले राजीव तनेजा जी। हमने एक-दूसरे से परिचय किया। मैंने देखा हाल में चारों और सभी सारे ब्लागर मित्र एक-दूसरे से गुफ्तगू में मशगूल थे। जितने पुरूष ब्लागर दिखाये दे रहे थे उनसे कहीं अधिक महिला ब्लागर वहां मुझे दिखी। कार्यक्रम में ब्लागर दोस्त लगातार बड़ रहे थे। योगेन्द्र मौदगिल जी दिखे, अविनाश जी भी तभी आए, वही दीपक गुप्ता भी साथ में दिखे हमसब एक-दूसरे से मिल रहे थे ओर जलपान चल रहा था। तभी मशहूर व्यंग्यकार प्रेम जनमेयजय जी तशरीफ ले आए। कार्यक्रम की अध्यक्षता उन्होने ही करनी थी।
राजीव जी ने स्वागत कार्यक्रम आरम्भ कराया। सरस्वती वंदना हुयी सबको पुष्प भेंट किए गए। कुछ औपचारिकताओं के बाद राजीव रंजन जी ने साहित्य शिल्पी के एक वर्ष की योगदान को स्लाइड प्रस्तुतिकरण के माध्यम से सबको दिखाया तथा ब्लाग और इंटरनेट पर हिन्दी के योगदान पर शानदार तरीके से अपने विचार रखे। एक सबसे लाजवाब बात जो इस कार्यक्रम की रही वो था इसका फार्मेट और उसकी मौलिकता। राजीव जी ने सबसे पहले जिसे हस्ती से लोगों को परिचित कराया था वो एक बुक सेलर श्री कुंद्रा जी थे। राजीव जी ने सस्ती साहित्यिक कृतियां बेचने के सन्दर्भ उनके योगदान को बताया। सभी लोग अभिभूत थे। इसके बाद अन्य मेहमानों ने भी अपने विचार रखें प्रेम जनमेयजय जी ने कमाल की बातें अपने साहित्यिक अनुभवों के बारे में साझा की। उन्होने अपनी त्रिनिनाद यात्रा के बारे में बताया कि वहां हिन्दी और साहित्य की क्या दशा है इसके अलावा वह हिन्दी और इंटरनेट तथा ब्लाग के बारें में भी जमकर बोले।
उन्होने बताया कि ब्लाग और वेब की इन साहित्यिक सेवाओं ने साहित्य से प्रवासी शब्द गायब कर दिया है, साहित्य सिर्फ साहित्य है, ना कि प्रवासी साहित्य। आगे उन्होने कहा ब्लाग या नेट लेखन पर आदमी संयम से परे हो जाता है, यहां लिखने के दौरान वे संयम को खो देता है। इसके बाद अन्य वक्ताओं व कवि/ब्लागर साथियों ने अपनी चुनिंदा कविताओं को रखा और इस प्रकार कार्यक्रम का पहला सेशन समाप्त हुआ। लंच के दौरान ब्लागर साथी एक-दूसरे से मिल रहे थे, जिन्हें अभी तक सिर्फ स्क्रीन पर ही देखा था वे अब लाइव मिल रहे थे। राजीव जी अविनाश जी स्वंय लोगों से भोजन के लिये निवेदन कर रहे थे। दूसरे सेशन में मेरे साथ में मीडिया खबर वाले पुष्कर पुष्प और टीवी प्लस वाले विनित बैठे थे। ये दोनो ही लजवाब बन्दे हैं। विनित ने तो जोरदार तरीके से अपनी बात रखी। उसने मुझे बताया कि मीडिया विषय पर वह शोध (मनोरजंन चैनलो की भाषिक संस्कृति) भी कर रहा है। बेहद संतुलित तरीके से पुष्कर ने भी अपने विचार रखें। अविनाश जी ने वहां पर सबको मेरी पुस्तक ब्लागिग के बारे में भी बताया। जिन ब्लागर साथियों ने अपने विचार रखे सबका नाम दे पाना तो मुश्किल है लेकिन जो याद रहे उनमें नमिता राकेश,सृजन के सुरेश यादव, अमन दलाल, शैफाली पांडे, विनोद कुमार पांडेय, पवन चंदन जी देशनामा वाले खुशदीप सहगल जी, तथा बहुत सारी महिला ब्लागरों ने भी अपने विचार रखें।
एक और मुख्य बात मुझे इस कार्यक्रम में दिखी कि फरीदाबाद के सभी गणमान्य अतिथी, पत्रकार, कवि और लेखक भी जमा थे। जो ब्लाग जैसे नये विषय को समझने के लिये उपस्थित थे। मुझसे इस कार्यक्रम में बहुत सारे लोगों ने मेरठ के ब्लागरों के बारे में भी पुछा, क्योंकि मेरठ के अनेक ब्लागरों ने अपने लेखन के जरिये विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना ली है, लेकिन बेहद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा कि मेरठ में कोई राजीव रंजन नही है जो ब्लागिग के लिये इतना सर्मपित कार्यक्रम कर सके। कार्यक्रम में भाग लेने के लिये गुड़गांव, फरीदाबाद, मेरठ, गाजियाबाद, दिल्ली, लखनऊ, हलद्वानी, पटना, पानीपत आदि जगहों से ब्लागर आए हुए थे।

खुद पर यकीन करना तो सिखिए

कल शाम एक पुराना दोस्त घर आया, बोला उसने एक जेनरेटर सेट 65 हजार रूपये में खरीदा, उसको रिपेयर किया और 1 लाख बीस हजार रूपये में बेच दिया। उसने कहा- उसे अपने आप पर यकीन नहीं हो रहा, कि वो इतने फायदे का सौदा कर आया हैं। वो हमेशा से ऐसा करना चाहता था, लेकिन कभी अपने आप को यकीन नही दिला पाया था कि वो इस तरह इसको बेच भी सकता है, लेकिन इस बार जैसे ही उसे पुराना जेनरेटर दिखाई दिया तब उसने फैसला कर लिया था कि वो इसको अच्छे दामों पर बेच लेगा और उसने बेच दिया।
खुद पर विश्वास करना ऐसा है, जैसे, मन चाही चीज़ हासिल हो जाना। नौकरीपेशा लोग महीने की पहली तारिख की प्रतिक्षा में रहते हैं, मजदूर शाम ढले अपनी मजदूरी की प्रतिक्षा में, दुकानदार माल बिकने के इंतजार में रहता है। हम सब लोग किसी ना किसी वजह से दूसरों को अपनी कामयाबी का आधार मानकर चलते हैं। हमने अपना यकिन अपने आप से हटाकर, दूसरों पर लगा रखा है। अगर आपने सफलता को लक्ष्य बना रखा है, तो दांव भी अपने ऊपर ही खेलना हो। आप खुद पर यकीन करना सीखिए। अपने आप को बताइए की कोई भी कार्य आपके लिए असम्भव नहीं है। क्योंकि जो सफलता आप अपने लिये चाहते हैं, उसके प्रक्ट्रिकल के लिये हमने दूसरों को कैसे चुन लिया। सफलता, जिसका अर्थ प्रत्येक व्यक्ति अपनी जरुरतों के हिसाब से लगाता है। किसी के लिये सफल होना बहुत अधिक पैसा होना होता है, किसी के लिए शौहरत और मान-सम्मान सफलता है, किसी के लिये शीर्ष पर पहुँचना सफलता है। लक्ष्य कुछ भी हो सकता है। सफलता यदि आपके लिए अभी तक असम्भव थी, तो ये मानिए की अब आप सफल होकर ही रहेंगे। आपका खुद को दिलाया गया यकिन सबमें अनमोल धरोहर बन जाता है आपके लिए। हमने जिस प्रकार सुबह उठकर पेस्ट करने को एक सरल प्रक्रिया मान रखा है, अपने जुते पाॅलिश करना या दूसरे ऐसे ही कुछ और काम, जिनमें कोई कठिनाई हमें नज़्ार नहीं आती और हम आसानी से इन कामों को कर लेते हैं। ऐसे ही कोई भी अन्य असम्भव प्रतीत होने वाला कार्य भी हम केवल विश्वास के बल पर सरलता से कर सकते हैं।
इसलिए खुद को यकिन दिलाइये, आपके लिए कोई भी कार्य असम्भव नहीं है। यदि कामयाबी का रास्ता किसी लम्बी सीढ़ी से होकर जाता है, तो खुद पर किया गया यकीन उसका पहला कदम है।

हिन्दी ब्लागिंग का एक दुर्लभ चित्र


इस चित्र को हाल ही मैं मैंने लिया है, ऐसा नज़ारा कभी-कभी ही देखने को मिलता है। ये दोनों महान लोग हिन्दी ब्लागिंग के लिये मील का पत्थर सिद्ध हुए है, दोनों ही पुराने खिलाड़ी है, और आज के सर्वाधिक लोकप्रिय ब्लागर के रूप में प्रतिष्ठित हैं। क्या आपको लगता है, इस चित्र में दुर्लभ होने जैसी कुछ बात है, यदि हां तो आप भी ब्लागिंग के दक्ष पुरोधा है, यदि नहीं तो कुछ पुराने ब्लाग पढ़िये?

आत्मा तक चित्कार उठती है

आजकल बारिशों का मौसम हैं। पूरा दिन टपकता रहता है, बारिश की वजह से कही बाहर जाना नही हो पा रहा था। शाम में पापूलर भाई आ गए थे, वो 30 जुलाई में एक प्रोग्राम करने जा रहे है, कुछ लोगों को कार्ड देने थे, मैं चल पड़ा। बारिशमें भीगते-बचते हम निकल पड़े, साथ में जमीर मियां थे, गाड़ी वो ही ड्राइव कर रहे थे। साढ़े सात या आठ बज रहे होगें, जोशी जी का फोन आया, किसी अमित सक्सैना का पता मालूम कर रहे थे, वो एक उपन्यासकार है, उन्होने ही मुझे बताया, किसी कविता पाकेट बुक्स ने उसका उपन्यास छापा है, मैंने मनेष जी को फोन खड़काया, हमेशा की तरह शाम को उनका फोन बन्द ही मिला, सलीम भाई से पता किया- कौन है ये अमित सक्सैना, उन्होने दो-तीन अमितों का हवाला दिया- मैंने जोशी जो को सलीम भाई के हवाले किया।
पापूलर जी के साथ आगे बढ़े बच्चा पार्क आ गया था, मैं घन्टाघर से ही डोसा खाने की सोच रहा था, यहां अच्छा डोसा मिल जाता है, कार्ड लगभग बंट चुके थे। हम बच्चा पार्क पर उतर गए। जमीर भाई चले गए थे। पापुलर जी ने कहा जब यहां आए है तो, धामा जी से भी मिलते चले, मैं फोन करता हूं, अगर वो हो तो, तुम रिक्शा रोको। एक रिक्शे वाला मेरी तरफ आया। इतनी बारिश में वो अकेला चोपले पर खड़ा हुआ था, वो एक बुढ़ा आदमी था, और भीगा हुआ था, बोला- कहां चलना है, ‘मैं चलता हूं’ तभी पापूलर भाई ने बताया कि अब नही जाना। धामा साहब घर पर नहीं है, आओ डोसा खाते है, वो गजीबो की और चल दिये।
उस बुढ़े रिक्शे वाले ने कहा- कि कोई भी बुढ़ा समझ कर मेरे रक्शे में नही बैठता, अभी तक बोनी भी नही हुयी, गांव से आता हूं मैं। उसकी बात सुनकर मैं एकदम से जड़ हो गया था, मुझे असीम करूणा उसमें दिखाई दे रही थी। कैसी लाचारी है, इसके साथ, मेरा दिल अन्दर से एकदम टुकड़े-टुकड़े हुए जा रहा था। आदमी के साथ भी क्या-क्या मजबूरीयां होती है, मैंने उस रिक्शे वाले से कहा- बाबा सबके साथ कुछ ना कुछ परेशानियां है, हर आदमी जो सही दिख रहा है, कही अन्दर से टूटा हुआ है। ये कहकर में आ गया। गजीबों में बैठे। डोसे का आर्डर दिया। एक छोटा सा बच्चा टेबल साफ करने आ गया। इतने छोटे-छोटे मेरे भांजे हैं, ये उनकी उम्र का ही होगा। में ये सोच रहा था। डोसा खाने में मन ना लगा। ऐसे ही छोड़ दिया। पापूलर जी ने पूछा क्या हुआ। मैंने कहा-कुछ नही आओं चलते है। घर आया, टेलीविजन पर देखा। भारत अब पहले से कही अधिक सम्पन और शक्तिशाली हो गया हैं। में इस तरक्की हो जब तक झूठा मानता हूं तब तक कोई बुढ़ा रिक्शे वाला भरी बारिश में रोटी के जुगाड़ के लिये मारा-मारा फिरता हो।

हिन्दी ब्लॉगिंग के 10 सबसे बड़े खतरें

हिन्दी ब्लागिंग तेजी से अपने कदम बड़ा रही है, लेकिन कुछ ऐसी बातें भी हो जो सबसे लिये समस्या बनकर आयी है, प्रस्तुत है, ऐसी ही 10 बातें।

1-बेनामी एक ( anonymous) बड़ी समस्या के रूप में उभर कर सामने आया है। ये जिधर चाहे मुंह मार देता है, कोई इसको रोकने-टोकने वाला नही है। इनको पकड़ने का अभी तक कोई पक्का इंतजाम नही है, ब्लॉगर आलोचना का स्वागत कर सकते है, लेकिन गालियों और बदतामिजी का नहीं। (बेनामी कोई और नहीं हैं, हम खुद ही चेहरा बदलकर एक-दूसरे को कोसते है)

2-हम लोग धड़ाधड़ लिखने पर उतारू हो गए है, लगातार पोस्टों पर पोस्टे दे रहे है, लेकिन सामूहिक रूप से हमारी फ्रिक ये बिल्कुल नही है कि हमें हमारे ब्लॉग से भी कुछ आमदनी होनी चाहिये, ये भी एक खतरा है, क्योकि अपने ब्लॉग पर हर कोई अपना बेस्ट देता है, जिसका उसे कुछ ना कुछ मेहनताना मिलना ही चाहिये।

3-लोगों को लिखने से मतलब, क्या लिखा, कुछ भी जो दिमाग में आया, फिर हम कहते है- अरे फलां का ब्लॉग बड़ा अच्छा चल रहा है, उस पर बहुत भीड़ रहती है, हमें अपने लेखन के जरिये अपने आप को ब्रांड में बदलना आना चाहिये। तभी हम अपना मजबूत पाठक वर्ग तैयार कर सकगें। (याद रखना ज्यादा टिप्पणीयां और प्रशंसक किसी के अच्छा लिखने की गांरटी नही है, बल्कि ये चापलूसी और टिप्पणी के बदले टिप्पणी वाला सिस्टम भी होता है।)

4. कुएं के मेढ़क बने रहना, हमेशा ही, प्रत्येक पोस्ट में एक सा लिखते रहना, चाहे वो सरकार को कोसना हो, हिन्दूव का ढोल पीटना हो, आंतकवाद की दुहाई हो। या इसके आस-पास जैसा कुछ। इससे बचे! ये आपके वातावरण और पालनपोषण को उजागर करता है।

5. ऐसे कई ब्लॉगर प्रकाश में आए है, जो तीन-तीन, चार-चार घटें के अतंराल से लगातार पोस्टे देते है। उनकी पोस्टों को पढ़ने वालो की कुल जमा-पूंजी चार या पांच लोग। (ये फिर भी बाज नही आते) ये एक दिन ब्लॉगिंग को फ्री से निकाल कर पैसों की करवाकर ही बाज आएगे।

6-सर्कीण मानसिकता वाले ब्लॉगरों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। धर्म को बचाने का ठेका इन्होने ही लिया हुआ है। अपनी घटिया बयानबाजी और एकतरफा लेखन से ब्लॉगिंग को प्रदूषित करने वाले ब्लॉगर भी बड़े खतरों में से एक है।

7- पुराने पुरोधाओं की गुम होती पहचान- अब तो काफी ब्लॉगर हो गए है, लेकिन कभी इस क्षेत्र के खिलाड़ी कोई और ही थे, एक ब्लॉगर जो पुणे में रहते है, तकनीकी विषेषज्ञ है, बड़ी गालियां बक रहे थे- हमने इतना कुछ किया हिन्दी ब्लॉगिंग को पहचान दिलायी, और आज हम ही गायब से हो गए। हमें इन लोगों को भी याद करना चाहिये, ये लोग भी हिन्दी ब्लॉगिंग के ब्लेक एण्ड व्हाइट दौर के नायक हुआ करते थे कभी।

8- अगर कोई किसी का मेटर उठा लेता है, तब हम क्या कर सकते है, ऐसा कोई प्रावधान नही है, क्योंकि यहां पर अधिकांशत लिखने वाले नॉन प्रोफेशनल है, कहीं छप नही पाए है, अगर आपके लेखन का कोई इस्तेमाल करे तो ये अच्छी बात है बशर्ते आपको भी उसका लाभ मिलना चाहिये।
9- कुछ सालों में ही हिन्दी ब्लॉगिंग की फिजा बदलने वाली है, दस-बीस हजार नही, लाखों की संख्या में ब्लॉगर लिख रहे होगे। आपका क्या होगा। कैसे टिकोगे, कभी सोचा है, अभी तो मजे की मिल रही है,

10- सबसे महत्वपूर्ण बात! आपने ब्लॉगिंग करते हुए किसी को क्या दिया। आप सिर्फ बकवास ही लिखते है, या कुछ बदलाव लाने वाला भी लिखते है, ऐसा कुछ जिसे पढ़कर पाठक प्रेरित हो, स्फुर्ति महसूस करे। (हिन्दी ब्लॉगिंग में अगर 13 हजार ब्लॉग है तो इनमें तीन प्रकार के ब्लॉग सर्वाधिक है, पहले वे लोग जो कविताए लिखते है, यहां कवियो और कवित्रियों की भरमार है, कविताएं भी ऐसी आदमी पढ़कर आत्महत्या की सोचने लगें। दूसरे जो सलाह देने वाले लोग है, देश ऐसे चलना चाहिये, नीतियां ऐसी होनी चाहिये, प्रधानमंत्री को ये करना चाहिये, इसने ये गलत कर दिया, मैंने ये सही कर दिया। दुनिया की सारी चिंताओं का हल इनके पास है, सिवा खुद के। तीसरे नम्बर पर वे ब्लॉगर सर्वाधिक है जो पत्रकार हुए जा रहे है, जिसको देखो वो यहां पत्रकार हुआ जाता है, अगर नही है, तो भी खुद को कहेगा जरूर। यहां क्या पत्रकारिता की डिग्रीयां बट रही है)