आलोक पुराणिक का ब्लॉग कबाड़खाना है

ब्लॉगिंग और कबाड़ का कुछ लेना देना नहीं है, लेकिन अपने बड़े भाई आलोक जी का ब्लॉग पूरा कबाड़खाना बना हुआ है, अब ये कबाड़ चुगने वाले पर निर्भर करता है कि वह यहां से मोती निकाल रहा है या बेकार की चीजे। कबाड़ की खासियत भी यही होती है कि उसमें दूर्लभ, बेशकीमती, और यूनिक चीजों का मिलना स्वाभाविक होता है और ये बात आलोक पुराणिक जी के ब्लॉग पर भी सटीक बैठती है। आलोक जी जाने-माने व्यंगकार है, जो अपना खुद का डोमेन लेकर ब्लॉग चलाते है, और आजकल अपनी पैनी धार को और भी पैना करने पर तुले हुए है।
आप तीखे तेवरों का इस्तेमाल करते हुए बचकर साफ निकलने की कला से बखूबी वाकिफ है। अभी तक के हिन्दी ब्लॉगरों में आप सबसे लाइव ब्लॉगर है जो प्रतिदिन के हिसाब से पोस्टे लिखते है, और प्रति घन्टे के हिसाब से पोस्ट देने की सम्भावना भी उनमे दिखाई देती है। हिन्दी ब्लॉगिंग में हर दूसरा ब्लॉगर अपने आपको पत्रकार सिद्ध करने पर तुला हुआ है। ऐसे में आलोक पुराणिक सर्वाधिक विश्वसनीय नाम है। राष्ट्रीय अखबारों पर आपकी पकड़ देखते ही बनती है, हिन्दी के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले दैनिक आपको विशेष जगह देते है, और आलोक जी अकसर नये-नये मुददों के साथ ठोका-पीटी करते हुए इनमे नुमाया रहते है।
आप अर्थशास्त्र पर अच्छी पकड़ रखते है और इसी के मास्ससाब है, दिल्ली कालेज में प्रोफेसरी करते है। वे पुराने जमाने के पी.एच.डी होगें ये बताने की जरूरत नहीं है। आज की हिन्दी में जो नयी तरह की भाषा का चलन बढ़ रहा है, उसमे आलोक पुराणिक का नाम लेना नहीं भूला जाएगा, और हिन्दी की ब्लॉगिंग में तो आप भाषा के एक नये प्रकार, और अजीबो-गरीब रव्वैय को आम करने पर उतारू है। आमतौर पर आलोक दूसरों की अच्छी पोस्ट पर 'धांसू च फांसू' कहना नहीं भूलते ऐसी और भी अनगिनत उपमाए आप न जाने कहां-कहां से लाते है। ये पहले ऐसे ब्लॉगर है जिसको लोग उसी भाषा में टिप्पणी देना चाहते है जिसे वह परोस रहा है। ''बहुत करारा आईटम लाये'' या फिर ''मस्त-मस्त पोस्ट'' या फिर ऐसे भी “क्र्कोघ्ह घ्ज्फ्द घ्ज्क्द द्द्फ्द्ग्र्ह्व घ्र्त्र्त्द्स्द फ्द्फ्ह्ग्फ्ह्ज घ्ह्ह्क्ज्द” अर्थात आपने क्या खूब लिखा है बधाई स्वीकारें , जैसी टिप्पणीया आपको आलोक जी की पोस्टें पर खिलखिलाती दिख जाएगी।
अपनी ही प्रकार की शैली का ब्लॉगर जिसने खुद अपनी तरह की भाषा को ब्लॉगिंग में मान्यता दिलाई। मशहूर ब्लॉगर Gyan Dutt Pandey जी आपके ब्लॉग के नियमित पाठक है वह आलोक जी की थकी हुई पोस्टों पर भी टिप्पणी करना नहीं भूलते। आलोक भाई मैथिली जी के बहुत बड़े प्रशंसक है। और कम्प्यूटर पर हिन्दी के तकनीकी विकास के योगदान में मैथिली जी के काम पर आपने शानदार पोस्टे लिखी है।
मैं आलोक जी को एक गुजरे जमाने से जानता हूं तब वह अपने मुछों वाले फोटो के साथ अपना कॉलम देते थे। आजकल तो क्लीन शेव नजर आते है, पहले आप अखबारों में जो तस्वीरे दिया करते थे, वे एक व्यंगकार का चुटीलापन लिए हुए गभ्भीरता की चाशनी के साथ नजर आती थी। आजकल आप, अपने बढ़िया टूथपेस्ट की खूबियों को दिखाने करने में लगे हुए है (वह अब क्लीन शेव के साथ कृत्रिम मुस्कूराहट वाली तस्वीरे ही देते है ) व्यंगकार होना बड़ी जिम्मेदारी का काम है, ये बात हम शरद जोशी जी या हरिशंकर परसाई या दूसरे नामी व्यंगकारों के काम से बखूबी समझ सकते है। शरद जोशी जी के व्यंग तो देश के प्रधानमंत्री की हवा भी निकाल देते थे। और ये काम सिर्फ एक व्यंगकार ही कर सकता है। इन महान व्यंगकारों का ये सलैक्टड काम था। बेहद चुनिंदा और सार्थक पर आजकल आलोक जी इस तरीके को भूल गए है। उनका यकीन अब क्वालिटी की बजाय क्वांटिटी की तरफ रहता है। धड़ाधड़ लिखने पर उतारू है, जैसा भी, जो भी दिखेगा, बस व्यंग कहना है जी, कुत्ता, बिल्ली, घोड़ा, हाथी, चिमटा, फूंकनी, बेलन, करछी जो हाथ आ जाए। इस चक्कर में व्यंग की मारक क्षमता तो हाथ से जाती ही है, साथ ही साथ पोस्ट बोझिल और उबाउ हो जाती है। व्यंग की लीद निकालने के इस तरीके को ब्लॉगिंग की हिंसक प्रवृत्ति कहना चाहिए।
मैं इस सबका ठिकरा आलोक जी के सर ना फोड़कर प्रसून जोशी के मत्थे मढ़ना चाहूंगा। प्रसून जोशी (प्रसिद्ध फिल्मी गीतकार, राइटर, विज्ञापन एजैसी के संचालक, आमिर खान के सबसे प्रिय, कोका कोला को नयी पहचान देने वाले और भारत में अपनी खास उपस्थिति को दर्ज करने वाला एक आम से खास बनने वाला व्यक्ति) ही वो आदमी है जिसको देखकर आलोक जी बिगड़ गए है। इस प्रसून के बच्चे ने जिस तेजी से कामयाबी पाई और कामयाबी के जो नए शार्टकट दिखाए वो किसी को भी बिगाड़ सकते है। बस शायद इन्हे देखकर ही अपने आलोक भय्या बिगड़ गए।
अब कर डाले कुछ आड़े-तिरछे काम, अशोक चक्रधर जी का दामन पकड़कर मंचीय कविता शूरू की, लेकिन वहां तो गलेबाजो और अदाकारों का कब्जा था। तो एक न चली, वापस हो लिए। फिर सुना की किसी टीवी कार्यक्रम के लिए प्रस्तोता होने जा रहे है, अब वो खबर भी पूरानी पड़ गई। आजकल धड़ाघड़ लिखकर अपने प्रशंसकों की संख्या कम करने पर लगे हुए है। लेकिन एक बात जो मैं बहुत अच्छे से जानता हूं कि जो आदमी ब्लॉगिंग को एक नयी दिशा देने की सार्मथ्य रखता हो वह अपनी धुरी पर लौटना भी बखूबी जानता होगा। हम अगर कल के किसी शरद जोशी या हरिशंकर परसाई की बात करते है, तो बहुत सम्भव है आज के आलोक पुराणिक की बात लोग कल करें।

(मेरा आलोक जी से प्रेम उतना ही बरकरार है, जितना कल था, उनके बहुत सारे प्रशंसकों में से, मैं भी एक हूं, और हिन्दी ब्लॉगरों पर ये तनकीदनिगारी किसी जाति उद्देश्य या भावना से नही बल्कि उनके काम और लेखन पर एक विचार या राय भर है। अगली समीक्षात्मक पोस्ट मशहूर ब्लॉगर जीतेन्द्र चौधरी ''मेरा पन्ना'' पर पढ़ना ना भूले। आपकी टिप्पणीयां मेरे लिए बेहद मूल्यवान है, जो अच्छा लिखने के लिए हमेशा प्रेरित करती रहती है।)

16 comments:

अनूप शुक्ल said...

आलोक पुराणिक पर ऐसे ही अपना प्रेम बनाये रखें ताकि वे और न बिगड़ें।

आशीष कुमार 'अंशु' said...

आपका पोस्ट पढ़ने के बाद यह समझ पाना कठीन हो रहा है कि जनाब आप कहना क्या चाहते हैं?

Shiv Kumar Mishra said...

"आलोक पुराणिक का ब्लॉग कबाड़खाना है"

कबाड़खाना तो शानदार सामूहिक ब्लॉग है. अशोक पांडे जी का. आप का प्रेम आलोक जी पर ऐसे ही बना रहे, यही कामना है.....

और कोई काम ना है?

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

अरे इतना सनसनीखेज शीर्षक देखकर तो मैं अचरज में आ गया !!
चलिए आपने तो अलग तरह से तारीफ़ ही की है ....

जबकि मैं तो <अपने ब्लॉग को सबसे बड़ा कबाड़ खाना समझ रहा था !!!

और अब सारे लोग आयें मेरी मदद करने मेरे द्वार !!!!!

Harkirat Haqeer said...

मैं आई तो थी शुक्रिया अदा करने पर आपके ब्‍लाग पर नई पोस्‍ट देख पढने बैठ गई क्‍या
गजब का लिखते हैं आप...! भाषा पर तो पकड है ही शब्‍दों का चयन भी बहुत अच्‍छा है...किसी
ब्‍लागर पर इतनी छानबिन के बाद इतनी गंभीरता से लिखने वाले आप अकेले होगें शायद?
ये आलोक जी कौन हैं याद नहीं आ रहा....? चलिए ढूँढ लेगें!

गिरीन्द्र नाथ झा said...

अच्छा लगा दोस्त, बेबाक लिखें ....

बवाल said...

शुक्रिया

नीरज गोस्वामी said...

अलोक पुराणिक जी विलक्षण हैं...उनकी लेखनी चुटीले वाक्य लिखने में सिद्ध हस्त है...आप ने उनके बारे में बहुत अच्छा लिखा है...
नीरज

Gyan Dutt Pandey said...

आलोक पुराणिक जी का नियमित पठन मेरे दिनचर्या का अंग सा बन गया है। प्रिण्ट में पढ़ता नहीं सो नेट पर उन्हें पढ़ता हूं। और उनके व्यक्तित्व का प्रशंसक हूं मैं।

shama said...

Irshaad bade hee bebaak tareekese likha hai..maine abtak unka blog to nahi padha...padha tha par sarsari taurse !
Ab phirse jaana hoga!
Mre blogpe tippaneeke liye shukrguzaar hun !
"Page load error" ke chalte behat mushkil ho rahi qareeb 25 baar koshish karti hun to, ekadh blog khul jaata hai aur mere communicationpe bada bura asar pada hai...kya kiya jaye?

अनुपम अग्रवाल said...

इरशाद.
मुक़र्रर .
माफी चाहूँगा मगर कहीं कलम महकी हुई तो कहीं बहकी हुई .

आशुतोष दुबे "सादिक" said...

aapne bahut thick baat kahi hai,aap aise hi likhte rahe.

Mansoor Ali said...

मैरी 'कमज़ोरी'' पर आपकी द्र्ष्टी पड़ी और में लपका आपकी तरफ़ , देखा कि आप आलोक जी की खबर ले रहे है,
निराला अंदाज़ है आप का भी. कभी मैने भी ब्लागरस पर निशाना साधने की कोशिश की थी [ब्लागर्स-1 से ब्लागर्स-6 तक]
एक सिरीज़ प्रकाशित की थी, मकसद था कि आम पाठको के अतिरिक्त हम ब्लागर्स के दरम्यान भी आत्मीयता बढे ,
रिस्पोन्स नही मिला. उस जपर प्राप्त टिप्पणियो से कारण झात होता है. खैर आपकी लेखनी के दम ने बहुतो का ध्यान
खींचा है. बधाई और धन्यवाद .
म्. हाशमी
http://www.mansooralihashmi.blogspot.com
http://www.hashimiyaat.mywebdunia.com

SALEEM AKHTER SIDDIQUI said...

irshad bhai
alok puranik ke bare main main aapne jaisa likha hai. wo qabile tarif hai. alok mere bhi fevrit hain. ek achhi post ke liye mubarkbaad.

विनय said...

बहुत सुन्दर लेख है,

---मेरा पृष्ठ
चाँद, बादल और शाम

पंगेबाज said...

इरशाद इरशाद