दिनभर के ज़रूरी कामों में से एक
मैंने अपने दादा से जूते पॉलिश करना सीखा, उनके पास चार छोटे ब्रश थे, ब्राउन पॉलिश के लिये, काली के लिये, दो पॉलिश लगाने के सॉफ्ट ब्रश और दो पॉलिश के बाद जूतों को चमकाने के लिये। इसके अलावा वो पानी वाला कत्थई और काला रंग भी रखते थे जो पॉलिश से पहले लगाते थे।
बाद के दिनों में मैंने अपने चाचाओं को बाबूजी को भी खुद के जूते पॉलिश करते हुए देखा। मेरे बच्चे भी मुझे पॉलिश करते हुए देखते है। दिल्ली आने पर देखा सैकड़ों लोगों के घरों में ना ब्रश था और ना ही पॉलिश। एक घरेलू संस्कार से वो लोग वंचित दिखें।
मेरा मानना है कि जिन लोगों के घरों में जूते पॉलिश होते रहे, वे जीवन के दूसरे अनुशासन और उच्च गुणवत्ता को भी जीते रहे। आजकल लोग जूते पॉलिश नहीं करते, स्पोर्ट्स शूज़ पहनते हैं या बाहर पॉलिश कराते होंगे। लेकिन घर में खुद अपने बच्चों के जूते पॉलिश करने का एक आनंद है, जिसे बयान नहीं किया जा सकता।
सिख धर्म में स्वयं के अहंकार को मारने का एक बेहद शानदार कर्म किया जाता है। ये लोग गुरुद्वारे के बाहर, किसी संगत में या अन्य दूसरे ऐसे अवसरों पर लोगों के जूते पॉलिश करते हुए दिखते हैं। जबकि ये लोग बड़े-बड़े रईस और धनाढ्य होते हैं।
जब मैं छोटा था, तो घर आए मेहमानों के जूते भी पॉलिश कर दिया करता था। और इसमें मज़ा आता था, लेकिन कमाल यह है कि आज भी जब बच्चों के या अपने जूते पॉलिश करता हूँ, तो महसूस होता है कि बचपन वाले उस आनंद में ज़रा भी कमी नहीं आई।
मेरे दोस्तों, ज़रा बताएँ कि आपने भी कभी खुद के जूते पॉलिश किए हैं या आज भी करते हैं?
— इरशाद दिल्लीवाला #LifeLessons #Irshaddilliwala #SimpleThings #ShoePolish


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